जनपद बस्ती में पो०ई०/ए०ई०एस० रोग की रोकथाम हेतु विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाड़ा के अन्तर्गत चूहा एवं छहुंदर नियंत्रण कार्यकम चलाया जायेगा जो दिनांक- (01.04.2025 से 30.04.2025) तक चलेगा। अभियान के अन्तर्गत निम्नानुसार कार्यक्रम चलाकर समस्त कृषकों/जनसमुदाय को रोग से बचाव एवं नियंत्रण हेतु जागरूक किया जायेगा-
पूछा नियंत्रण का साप्ताहिक कार्यक्रम कृपकते द्वारा खेतो/फसल क्षेत्रो मे साप्ताहिक कार्यकम घलाकर चूहो पर नियत्रंण किया जा सकता है।
चूहा नियंत्रण अभियान के अन्तर्गत तिथिवार किये जाने वाले कार्य-
प्रथम दिन-क्षेत्र अमण एंव कार्यस्थल की पहचान करना।
दूसरा दिन-खेत/क्षेत्र का निरीक्षण एंव बिलों को धन्द करते हुये चिन्हित कर झण्डे लगाये।
तीसरा दिन-ोत/क्षेत्र का निरीक्षण कर जो बिल बन्द हो रहा आण्डे हटा दे. जहा पर दिल खुले पाये यहां पर इझण्या लगे रहने दे।खुले बिल में एक भाग सरसो का तेल एंव 48 गान भुना चना/गेंहू / चावल आदि से बने चारे
को बिना जहर निलाये बिल में रखे।
चौथा दिन-बिलो का निरीक्षण कर बिना जहर का चारा पुनः रखे।
पांचवा दिन-जिंक फारफाईन 80 प्रतिशत की 21 ग्राम मात्रा को 01 ग्राम सरसों तेल व 48 ग्रान भुना चना/गेहू
आदि से चने धारे को दिल में रखें।
छठवां दिन-बिलों का निरीक्षण यारें तथा गरे चूहों को एकत्र कर जमीन में गाड दे।
सातवा दिन-विलो को पुनः बन्द कर दे।
अगले दिन यदि बिल खुले पाये जाए तो कार्यक्रम पुनः अपनाये।
चूहा नियंत्रण की अन्य विधाएं:-
चूड़े मुख्यतः दो प्रकार के होते है-घरेलू एवं खेत्त/क्षेव को चूहे। घरेलू चूहां घर में पाया जाता है जिसे मूशक कहा जाता है। क्षेत/क्षेत्र के चूहों में फील्ड रेट साप्ट फील्ड रैट एथे फील्ड माउस प्रमुख है. भूरा चूहा खेत/क्षेत्र व घर में दोनों में तथा जगली चूहा जंगल रेगिस्तान, झाडियों में पाया जाता है।
1. चूहे की संख्या नियत्रित करने के लिये अन्न भण्डारण पक्का कंक्रीट तथा धातु से बनी बखारी/पात्रों में मारमा बाहिए ताकि उनको नोज्य पदार्थ सुगमता से उपलब्ध ना हो।
2. चूहे अपना दिल झाडियों मेडो, कूड़ों आदि में स्थायी रूप से बनाते है। सौंता/क्षेत्रों का समय समय पर निरिक्षण एवं साफ-सफाई करके उनकी संख्या नियंत्रित कर सकतें है।
१ चूहों के प्राकृतिक शत्रुओं-बिल्ली, सांप, उल्लू बाज, चमगादण आदि द्वारा चूहों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इनको संरक्षण देने से चूहों की संख्या नियंत्रित हो सकती है।
4. एल्यूमिनियम फास्फाईड दया की 3-4 ग्राम मात्रा प्रति जिन्दा बिल में डालकर बिल बन्द कर देने से उससे निकलने वाली गैस से चूहे सर जाते है।
चूहा नियंत्रण अभियान का कियान्यवनः-
1. कार्यक्रम के किन्यान्यधन हेतु कृषि विभाग के समस्त पार्नबाहरयो-ए०टी००एम०, मी०टी०एम०, प्रविधिक सहायक आदि के द्वारा ग्राम पंचायत स्तर पर गावी में जा कर नोस्टी, चौपाल अथवा कृपको से व्यक्तिगत सम्र्पक कर उन्हें जागरुक किया जाएगा।
2. चूत नियंत्रण कार्यकम अभियान के रूप में चलाया जायेगा जिसमें स्वंय सेवी संगठनों स्वंय सहायता समूहों किसान क्लबों, कृषि तकनीकी प्रबन्ध अभिकरण (आत्मा), बीज उर्वरक / रसायन विक्रेता इफकों सहकारिता का सहयोग जप्त किया जायेगा।
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3. दिनांक-01.04.2025 से 30.04.2025 तक के मध्य चूहा नियंत्रण के विषय में परिचर्चा के माध्यम से जनपद / तहसील / ब्लाक, ग्राम पंचायत स्तर पर चूहा नियंत्रण अपनाने के लिये जन सामान्य को प्रोत्साहित किया जायेगा।
4. चूहा नियंत्रण के संम्बन्ध में स्थानीय समाचार पत्रों मीडिया आदि माध्यमों से भी जानकारी जनसामान्य तक पहुंचायी जायेगी।
5. स्थानीय ग्रामवासियों की सहभागिता से चूहा नियंत्रण से संम्बन्धित नारों की वाल राईटिंग कराकर भी लोगो को जागरूक किया जायेगा।
6. इस अभियान के क्रियान्वयन में जनसामान्य का सहयोग प्राप्त करते हुए जनसहभागिता सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया जायेगा।
मच्छर प्रतिरोधी पौधेः-
मच्छर विभिन्न प्रकार के रागो-ए०ई०एस०/ जे०ई०, डेंगू, मलेरिया इत्यादि के वेक्टर (वाहक) के रुप में कार्य करते है। मच्छरों को कुछ विशेष पौधों को लगाकर नियंत्रण किया जा सकता है जैसे गेंदा, गुलदाउदी, सिट्रोनेला, रोज मैरी, तुलसी, लेवेंन्डर, जिरैनियम। ये पौधे तीव्र गंन्ध याले एसेन्शियल आयल अवमुक्त करतें है जिनसे मच्छर दूर भाग जारों है इस प्रकार इन फूल पौधों को घरों के आस पास लगाने से वातावरण तो सुगंन्धित होता ही है साथ ही खतरनाक मच्छरो से भी बचाय होता है। इनमें से कुछ प्रजातिंयो द्वारा तो ऐसे रासायनिक तत्व मुक्त किये जातें है जो गच्छरों की प्रजनन क्षमता ही समाप्त कर देतें हैं। इस प्रकार इन पौधो के रॉपड द्वारा भी मच्छरों को दूर कर जे०ई०/ए०ई०एस रोग से बचाव किया जा सकता है।
उक्त जानकारी
(रतन शंकर ओझा) जिला कृषि रक्षा अधिकारी बस्ती ने
प्रेम विज्ञ
प्ति के माध्यम से दी ।